गर्मी की दस्तक के साथ जंगलों में महुआ की हलचल तेज, बारिश ने बढ़ाई ‘गरीबों के सोने’ पर आफत, महुआ चुनते नजर आये समाजसेवी शहजाद अंसारी
टुंडी के ग्रामीणों के लिए ‘सोना’ है महुआ का फूल, असमय बारिश से खिले चेहरों पर मायूसी।
(विवेकानंद तुरी)
टुंडी /धनबाद : गर्मी शुरू होते ही गांवों में महुआ के पेड़ों के नीचे अलग ही हलचल दिखाई देने लगा है. टुंडी के सुदूर ग्रामीण इलाकों में महुआ को यूं ही ‘गरीबों का सोना’ नहीं कहा जाता है वन से अच्छादित टुंडी एवं पूर्वी टुंडी में इन दिनों महुआ का पेड़ो गिरना चरम पर है पर असमय बारिस से महुआ को छति पहुंचा है। टुंडी के दुर्गारायडीह, कमालपुर, धोबियासिंगा, लुकैया, बसाहा, बिरंची, साल पहाड़, गुवकोला के अलावे पश्चिमी टुंडी के भूसकी, बंदोजोर, जाताखुटी, चीना पहाड़ी, बाघमारा, बड़ा नागपुर, खरियोटाँड़ समेत पूर्वी टुंडी के चालधोवा, जबरदाहा आदि जंगलो में पेड़ से गिरने वाला हर फूल उनकी सालभर की कमाई से जुड़ा होता है.
जानवरों से बचाने और कोई दूसरा न उठा ले जाए इस वजह से ग्रामीण महुआ चुनने अहले सुबह से ही पेड़ो के पास पहुंच जाते है। बताया जाता है कि इसी समय से महुआ के फूल तेजी से गिरने लगते हैं. गर्मी के मौसम इसके लिए उपयुक्त है। जैसे-जैसे धुप तेजी से बढ़ने लगता है तब महुआ का गिरना समाप्त हो जाता है। वन भमि में रहने वाले एवं इससे आजीविका चलने वाले बारिश से महुआ का छटी से काफी आहत है। उधर समाजसेवी शहजाद अंसारी का कहना है की महुआ का फूल मादक पादर्शो के अलावे कई प्रकार के खाने-पीने, देसी दवा, पशुचारे और कई घरेलू कामों में इसका उपयोग होता है तथा इसको लेकर थोक विक्रेता ग्रामीणों के घर से लगभग एक सौ रूपये अधिक किलो के भाव से खरीद कर ले जाते है।
जिससे घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं. ग्रामीण इसे पशुओ के चारा में भी इस्तेमाल करते है। कई लोगो महुआ बेच कर अपने कई महत्वपूर्ण कामो को अंजाम देते है। यह जंगल में रहने वाले ग्रामीणों का आजीविका का सहारा बनती है.
























